Modern History of Madhya pradesh in hindi – मध्य प्रदेश का आधुनिक इतिहास

Modern History of Madhya pradesh in hindi

दोस्तों आपका हमारी website में स्वागत है| आज हमने इस लेख में Modern History of Madhya Pradesh in hindi के बारे में जानकारी दी है| यह आपके सामान्य ज्ञान तथा परिक्षाओं की तैयारी करने में सहायता प्रदान करेगा| 

मध्य काल

दिल्ली सल्तनत काल : 1206 से 1526 ई.

मध्य प्रदेश में 10 वीं शताब्दी में ही आक्रमण शुरू हो गये थे| दिल्ली सल्तनत के शासक ऐबक ने बुंदेलखंड को जीत लिया| ऐबक की मृत्यु के पश्चात प्रतिहारों ने पर, चंदेलों ने कालिंजर तथा अजयगढ़ पर अधिकार कर लिया था|

1231 ई. इल्तुतमिश द्वारा ग्वालियर के किले को जीत लिया था| 1233-34 में इल्तुतमिश ने कालिंजर पर विजय प्राप्त की| 1234-35 ई. में इल्तुतमिश ने मालवा पर आक्रमण किया तथा भिलाना व् उज्जैन से काफी मात्रा में धन लुटा|

1305 ई. में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मुल्तान के सूबेदार आईल-उल-मुल्क को मालवा पर आक्रमण के लिए भेजा| इसके बाद उसने उज्जैन, धारानगरी व् चंदेरी इत्यादि को भी जीता| यहाँ से प्रथम बार मालवा का दिल्ली सल्तनत में प्रवेश हुआ|

1401 ई. में दिलावर खां की मृत्यु के पश्चात मालवा का शासक हुसैनशाह बना, जिसे गुजरात के शासक मुज्जफरशाह द्वारा मालवा पर आक्रमण के फलस्वरूप कैद कर लिया गया| मालवा के विद्रोह होने पर मुज्ज्फ्फरपुर ने हुसैनशाह को भेजा| इन्होने मांडू को अपनी राजधानी बनाया| 


Modern History of Madhya Pradesh in hindi

Modern History of Madhya Pradesh in hindi

मुगल काल

बाबर ने 29 जनवरी, 1528 को मालवा के सूबेदार मेदनिराय को पराजित कर चंदेरी पर अपना अधिकार बनाया| बाबर के पश्चात मुगल शासक हुमायूँ ने सम्पूर्ण मालवा को जीतकर मुगल सम्राज्य में मिला लिया| कन्नौज के विलग्राम के युद्ध में शेरशाह ने मुगल सम्राट हुमायूँ को पराजित कर उसके राज्य मांडू,उज्जैन,सारंगपुर आदि के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया|

उसने 1545ई, में बुन्देलखंड के कालिंजर किले पर आक्रमण किया, जिसमें बारूद फटने से शेरशाह की मृत्यु हो गयी| यह किला किरात सिहं के कब्जे में था| मुगल सम्राट अकबर ने अधम खां को 1561ई. में मालवा पर आक्रमण हेतु भेजा| अधम खां ने बाज बहादुर को परास्त कर मालवा पर अधिकार कर लिया| अकबर ने रानी दुर्गावती के गोंडवाना प्रदेश पर आसफ खां को भेजा|

इसमें मुगल सेना की विजय हुई| अकबर द्वारा 1579ई. में कालिजर के जिले पर अपना अधिकार कर लिया| अकबर ने 1601ई. में असीरगढ़ के किले पर अपना अधिकार जमाया| औरंगजेब के काल में मालवा तथा बुन्देलखंड में विद्रोह हुए|

 

ओरछा के राजा चंपत राव ने भी औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया| हालाँकि इसके पुत्र छत्रवाल ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली| 1707ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात वह बुंदेलखंड का स्वतंत्र शासक बनाया गया,पर उन्होंने पेशवा बाजीराव को सहायतार्थ बुलाया व् फिर दोनों ने मिलकर बंग्स को पराजित किया|

इस युद्ध में बंग्स को स्त्री का वेश धारण कर भागना पड़ा था| बाद में छत्रसाल ने पेशवा वाजीराव को अपना तृतीय पुत्र मानकर सागर, दमोह, जबलपुर, शाहगढ़, खिमलासा और गुना, ग्वालियर के क्षेत्र प्रदान किये| पेशवा ने सागर, दमोह में गोविंद को अपना कार्यकारी बनाया| जबलपुर में बीसा जी गोविंद की नियुक्ति की गयी|

गढ़ मंडला में गोंड राजा नरहरि शाह का राज्य था| मराठों के साथ संघर्ष में आबा साहब मोरी व् बापूजी नारायण ने उसे हटाया| कालांतर में पेशवा ने रघुजी भोंसले को इधर का क्षेत्र दे दिया| भोंसले के पास पहले से नागपुर का क्षेत्र था| यह व्यवस्था अधिक समय तक नहीं टिक सकी| अग्रेंज सारे देश में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे हुए थे|

मराठों के आन्तरिक कलह से उन्हें हस्तक्षेप का अवसर मिला| सन 1818 में पेशवा को हराकर उन्होंने जबलपुर-सागर क्षेत्र रघुजी भोंसले से छीन लिया| सन 1817 में लॉर्ड हेस्टिग्स ने नागपुर के उतराधिकारी के मामले में हस्तक्षेप किया और अप्पा साहब को हराकर नागपुर एवं नर्मदा के उपर सारा क्षेत्र मराठों से छीन लिया|

उनके द्वारा इसमें निजाम का बरार क्षेत्र भी शामिल किया गया| सहायक संधि के बहाने बरार को वे पहले ही हथिया चुके थे| इस प्रकार अंग्रेजों ने मध्य प्रांत व् बरार को मिला-जुला प्रांत बनाया| महराज छत्रपाल की मृत्यु के बाद विंध्य प्रदेश,पन्ना,रीवा,विजावर,जयगढ़,नागौद आदि छोटी-छोटी रियासतों में बंट गया|

अंग्रेजों ने उन्हें कमजोर करने के लिए आपस में लड़ाया और संधियाँ की| अलग-अलग संधियों के माध्यम से इन रियासतों को ब्रिटिश सम्राज्य के सरंक्षण में ले लिया गया| सन 1722-23 में पेशवा बाजीराव ने मालवा पर हमला कर लुटा था| राजा गिरधर बहादुर नागर उस समय मालवा का सूबेदार था| उसने मराठों के आक्रमण का सामना किया| जयपुर नरेश सवाई जयसिहं मराठों के पक्ष में थे| पेशवा के भाई चिमनाजी अप्पा ने गिरधर बहादुर और उसके भाई दयाबहादूर के विरुद्ध मालवा में कई अभियान किये|

सारंगपुर के युद्ध में मराठों ने गिरधर बहादुर को हराया| मालवा का क्षेत्र उदासी पवार और मल्हार राव होल्कर के बीच बंट गया| बुरहानपुर से लेकर ग्वालियर तक का भाग पेशवा ने सरदार सिंधियां को प्रदान किया| इनके साथ ही सिंधियां ने उज्जैन, मंदसौर तक का क्षेत्र अपने अधीन किया| सन 1731 में अंतिम रूप से मालवा मराठों के तिन प्रमुख सरदारों पवार (धार एवं देवास), होलकर (पश्चिम निमाड़ से रामपुर-भानपूरा) और सिंधियां (बुरहानपुर, खंडवा, टीमरनी, हरदा, उज्जैन. मंदसौर व् ग्वालियर) के अधीन हो गया|

 

भोपाल पर भी मराठों की नजर थी| हैदराबाद के निजाम ने मराठों को रोकने की योजना बनाई,लेकिन पेशवा बाजीराव ने शीघ्रता की और भोपाल जा पहुंचा तथा सीहोर, होशंगाबाद की क्षेत्र उसने अपने अधीन कर लिया| सन 1737 में भोपाल के युद्ध में उसने निजाम को हराया| युद्ध के उपरांत दोनों की संधि हई| निजाम ने नर्मदा-चम्बल क्षेत्र के बीच के सारे क्षेत्र पर मराठों का अधिपत्य मान लिया|

रायसेन में मराठों ने एक मजबूत किले का निर्माण किया| मराठों के प्रभाव के बाद एक अफगान सरदार दोस्त मोहमद खां ने भोपाल में स्वतंत्र नवाबी की स्थपाना की| बाद में बेगमों का शासन आने पर उन्होंने अंग्रेजों से संधि की और भोपाल अंग्रजों के सरंक्षण में चला गया|

अंगेजों ने मराठों के साथ पहले,दुसरे,तीसरे,चौथे युद्ध में क्रमश:  पेशवा, होलकर, सिंधियां और भोंसलें को परास्त किया| पेशवा बाजीराव द्वितीय के काल में मराठा संघ में फुट पड़ी और अंग्रेजों ने उसका लाभ उठाया| अंग्रजों ने सिंधियां से पूर्वी निमाड़ और हरदा-टिमरनी छीन लिया और मध्य प्रान्त में मिला लिया| अंगेजों ने होलकर को भी सिमित कर दिया और मध्य भारत में छोटे-छोटे राजाओं को, जो मराठों के अधिस्न्थ सामंत थे, राजा मान लिया|

मध्य भारत में सेंट्रल इन्डियन एजेंसी स्थापित की गयी| मालवा कई रियासतों में बंट गया| इन रियासतों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु महू, नीमच, आगरा, बैरागढ़ आदि में सैनिक छावनियां स्थापित की गयी|

आधुनिक काल 

ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के साथ मध्य प्रदेश के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ| पेशवा बाजीराव ने उत्तर भारत को जीतने की योजना बनाई| इसी समय छत्रसाल ने मुगल सूबेदार बंगश से टक्कर होने पर पेशवा बाजीराव को सहायता के लिए बुलाया| दोनों ने मिलकर बंगश को पराजित किया|

छत्रसाल नैनेश्वर बाजीराव को दमोह, सागर, शाहगढ़, गुना, धामोनी खिमलासा तथा ग्वालियर के क्षेत्र प्रदान किए| गढ़ मंडला में गौड शासक राजा नरहरि शाह का शासन था| अप्पा साहब मोरे तथा बापूजी नारायण के नेतृत्व में मराठों ने उसे पराजित किया| इस समय अंग्रेज भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे हुए थे| मराठों की आतंरिक कलह से अंग्रेजों के हस्तक्षेप करने का मौका मिला| उन्होंने 1818 में पेशवा को हटाकर रघुजी भोंसले से जबलपुर और सागर का क्षेत्र छीन लिया

 1817 में अंग्रेजों ने नागपुर उत्तराधिकारी मामले में हस्तक्षेप कर अप्पा साहब को हटाकर नागपुर एवं नर्मदा के उत्तर का समस्त क्षेत्र मराठों से छीन लिया| सहायक संधि के बहाने अंग्रेज बरार को पहले ही ले चुके थे| अतः अंग्रेजों ने मध्य प्रांत तथा बरार को मिला जुला कर प्रांत बनाया| छत्रसाल की मृत्यु के पश्चात विंध्य प्रदेश,रीवा,पन्ना,जयगढ़, बिजावर, नागौद आदि छोटी-छोटी रियासतों को बंट गया

 

अलग-अलग संधियों के द्वारा इन रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण में ले लिया गया 1722 -723 ईस्वी में बाजीराव ने मालवा पर हमला किया तथा उसे लूट लिया| मालवा के क्षेत्र पवार तथा मल्हारराव होलकर के लिए बट गया बुरहानपुर से ग्वालियर तक का क्षेत्र पेशवा द्वारा सिंधिया को प्रदान किया गया| सिंधिया द्वारा उज्जैन तथा मंदसौर तत्व का क्षेत्र अपने अधिकार में ले लियामराठे भोपाल को भी जीतना चाहते थे

 निजाम ने ब रातों को रोकने के लिए एक योजना बनाई लेकिन बाजीराव में शीघ्रता से भोपाल पर आक्रमण किया और उससे से सीहोर, होशंगाबाद का क्षेत्र अपने अधीन कर लिया| उसने 1737 ईस्वी में भोपाल के युद्ध में निजाम को पराजित किया निजाम तथा मराठों के मध्य संधि हुई| निजाम ने नर्मदा चंबल क्षेत्र के मध्य के सहारे भाग पर मराठों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया

मराठों के प्रभाव के पश्चात एक अफगान सरदार दोस्त मोहम्मद खान ने भोपाल में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की| पेशवा बाजीराव द्वितीय के काल में मराठा संघ में फूट पड़ी अंग्रेजों द्वारा इसका लाभ उठाया गया| अंग्रेजों ने सिंधिया से पूर्वी निमाड़ और हरदा टिमरनी छीन लिया तथा मध्य प्रांत मैं मिला लिया मालवा को गए रियासतों में बांध दिया गया| इन रियासतों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु सैनिक छावनीयां स्थापित की गई

 

 1857 का विद्रोह :- 1857 क क्रांति में मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान था| 10 मई, 1857 में मेरठ में सैनिकों द्वारा विद्रोह किया गया| इसका प्रभाव मध्य प्रदेश तक फैला| 3 जून, 1857 को मध्य प्रदेश में क्रमश: नीमच मंदसौर तथा ग्वलियर में विद्रोह हुआ| जुलाई 1857 में शिवपुरी, इंदौर,महू तथा सागर में विप्लव फ़ैल गया| 14 जून, 1857 तथा 20 जून, 1857 में क्रमश: मुरार छावनी तथा शिवपुरी में विद्रोह आरम्भ हुआजुलाई, 1857 में अमझेटा, सरदार खुरा तथा भोपावार में विद्रोह प्रारंभ हुआ। अगस्त 1857 में सागर तथा नर्मदा घाटी  के समस्त प्रदेशों में असैनिक विद्रोह प्रारंभ हुआ। ग्वालियर में झांसी की रानी तथा तात्या टोपे ने विद्रोह की कमान संभाल ली। अंतत: अंग्रेजों ने 28 जून, 1858 में अंग्रेजों द्वारा इन दोनों  की संयुक्त सेना को पराजित किया गया। इस युद्ध में झांसी की रानी वीरगति को प्राप्त हो गईलेकिन तात्या टोपे बच निकले। कुछ समय पश्चात् तात्या टोपे को सिंधिया के सामंतों द्वारा पकड़ लिया गया और उन्हें अंग्रेजों के हाथों में सौंप दिया गया। अंग्रेजों ने तात्या टोपे को शिवपुरी में फांसी दे दी।

3 जून, 1857 ई. में नीमच के सैनिकों द्वारा वहां की छावनी में आग लगा दी गई। 14 जून, 1857 को ग्वालियर के समीप मुरार छावनी में सैनिक विद्रोह आरंभ हुआ। ग्वालियर तथा शिवपुरी के मध्य सैनिकों द्वारा संचार व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया, जिससे संपर्क लाइन बाधित हो गई। 20 जून, 1857 में जब शिवपुरी में विद्रोह भड़का तो रानी अंग्रेज अधिकारियों को गुना छोड़कर भागना पड़ा। बुन्देलखंड के स्थानीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। जुलाई, 1867 ई. में सारात सां के नेतृत्व में इंदौर जा रही  सेना पर विद्रोहियों द्वारा हमला किया गया। अंग्रेजी सेना को  असफलता हाथ लगी। हालांकि सभी अंग्रेजी अधिकारी इंदौर में ही मौजूद थे, लेकिन विद्रोहियों के आक्रामक रुख के कारण वे अपने परिवारों के साथ सीहोर चले गए|

 

1857 और उसके पूर्व के प्रमुख विद्रोही एवं स्थल 

क्रं.सं.

विद्रोही 

स्थल 

शाहदत खान 

महू 

2

राजा ठाकुर प्रसाद 

राघवगढ़ 

3

शंकर शाह 

गढ़ मंडला 

4

शेख रमजान 

सागर 

5

टटेया भील 

खरगैन

6

लक्ष्मीबाई 

झाँसी 

7

सुरेंद्र साई 

सम्बलपुर 

8

भीमा नायक 

मण्डलेश्वर 

9

तांत्या टोपे 

कानपुर-झाँसी 

10

अवंतिबाई 

रामगढ़ 

11

झलकारी बाई 

झाँसी 

12

गिरधारी बाई 

झाँसी 

13

श्री बहादुर एवं देवी सिहं 

मंडला 

14

नारायण शाह 

रायपुर

 

महू में भी जुलाई 1857 में विरोध प्रारंभ हुआ तथा सैनिकों ने भी इसमें भरपूर साथ दिया। इस समय दिल्ली के शहजादे हुमायूं द्वारा मंदसौर जाकर मेवाती, सिंधिया तथा बनावली सेना के कुछ सैनिकों की सहायता से एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जो फिरोजशाही के नाम से मंदसौर का राजा बन गया। मंडलेश्वर की सेना की टुकड़ी ने सेंट्रल जेल पर हमला बोल दिया। यहां पर भीमा नायक नामक एक आदिवासी के नेतृत्व में भी विद्रोह हुए। इसके अतिरिक्त मंडला जिले में रामगढ़ रियासत की अवंतीबाई ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया।

उसने मंडला की सीमा पर खेड़ी गांव में अपना मोर्चा स्थापित किया एवं सेनापति वार्डन को क्षमा मांगनी पड़ी। रानी अवंतीबाई ने रामगढ़ के तहसीलदार पर हमला कर दिया। तीन माह के कड़े संघर्ष के पश्चात् रानी रामगढ़ छोड़कर देवहारगढ़ के जंगल की ओर चली गई। अंग्रेजों ने उसका जंगल में पीछा किया। जंगल में दोनों के मध्य युद्ध प्रारंभ हुआ। जब रानी को यह लगा कि वह पकड़ी जा सकती है, तो उसने आत्महत्या कर ली।

 

स्वतंत्रता आंदोलन 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन 1885 ई. में मुंबई में किया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास किया| इसी बीच खंडवा नेसुबोध सिन्धुव् जबलपुर से जबलपुर टाइम का प्रकाशन प्रारंभ किया गया

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्र कर्मवीर के माध्यम से इसके प्रचार में नई दिशा दी। 1907 में जबलपुर में एक क्रांतिकारी दल का गठन किया गया। 1923 में जबलपुर में सत्याग्रह देवदास गांधी, राजगोपालाचार्य तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया। जबलपुर के सेठ गोविंद दास व पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में 6 अप्रैल, 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की गई। इसी वर्ष में जंगल सत्याग्रहका आरंभ हुआ।

1916 ई. में राज्य के सिवनी जिले में स्वतंत्रता आंदोलन आरंभ हुआ। 1922 ई. में भोपाल रियासत के सीहोर क्षेत्र में कोतवाली के सामने विदेशी फेल्ट केप की होली दिखाई दी। 1938 ई. में भोपाल में भोपाल राज्य प्रजामंडल की स्थापना की गई। इसमें मौलाना तरजी मशरिकी को सदर व चतुर नारायण मालवीय को मंत्री के रूप में चुना गया। बैतूल जिले के घोड़ा डोंगरी के आदिवासियों ने भी नमक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ।।30 ई. में हुए जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व शाहपुर के निकट स्थित बंजारी सिंह कोरकू द्वारा किया गया। रतलाम में 1920 ई. में कांग्रेस कमेटी कीस्थापना की गई। इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में मोहम्मद उमर खान को नामित किया गया।

यहां राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात स्वामी ज्ञानानंद की प्रेरणा से हुआ| यहां पर 1931 ईस्वी मेंस्त्री सेवादलतथा उच्च 1935 ईसवी मेंप्रज्ञा परिषदकी स्थापना की गई

1934 ई में झाबुआ जिलें में प्रजामंडल की सहायता से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराबबंदी व् हरिजन उद्धार संबंधी आन्दोलन प्रारम्भ किये गये| अंग्रेजी सेना द्वारा इन स्वतंत्रता सेनानियों पर हमला किया गया तथा इन्हें कारागार में डालकर कष्टप्रद यातनाएं दी गई इसी समय भोपाल राज्य हिंदू सभा की नींव डाली गई

15 अगस्त 1947 ईस्वी को भारत स्वतंत्र हुआ तब हम मध्य भारत व उसके अंतर्गत सभी रियासतों को मिलाकर मध्य प्रदेश नामक राज्य बना|

 

Important facts about Madhya Pradesh

महत्वपूर्ण तथ्य / रोचक तथ्य 

  • मध्यप्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध सर्वप्रथम विद्रोह महाकौशल क्षेत्र में 1818 में हुआ|
  • 1833 में रामगढ़ के युवराज देवनाथ सिहं ने अग्न्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया, जो असफल रहा
  • 1482 को दुराभी की संधि हुयी
  • 3 जून, 1857 को प्रदेश की नीमच छावनी के पैदल और घुड़सवार सैनिकों ने विद्रोह किया, जिसे कर्नल सी.बी.सोबर्स ने दबाया
  • 14 जून 1857 को ग्वालियर के निकट मोगरा छावनी के सैनिकों ने संचार व्यवस्था भंग कर थोड़े दोनों के लिए ग्वालियर पर अधिकार कर लिया
  • जुलाई 1857 में विद्रोहियों से बचाने के लिए कर्नल डयुरेंड, कर्नल ट्रेबरन व् कोब को भोपाल की बेगम सिकन्दर ने शरण दी
  • दिल्ली के शहजादा हुमायूं ने 1857 में मंदसौर में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और फिरोज शाह नाम धारण किया था
  • 22 मई 1858 को कालपी ह्यूरोज की सेना पर रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने आक्रमण किया
  • मंडला जिले की रियासत रामगढ़ की राणी अवंतिबाई ने देवहारगढ़ के जंगलों में 20 मार्च,1858 को अंगरक्षिका गिरधारी बायीं की कटार से खुद को मार लिया था
  • भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस (1885 में स्थापित) की मध्य प्रदेश में वास्तविक हलचल 1904 में शुरू हुयी| डॉ.हरी सिहं गौड ने 1940 में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की कटु आलोचना की
  • कांग्रेस का प्रांतीय अधिवेशन मध्य प्रदेश में 1906 में जबलपुर में आयोजित हुआ
  • 1907 में क्रन्तिकारी दल तथा 1915 में होमरूल लीग की स्थापना जबलपुर में की गयी
  • कांग्रेस की खिलाफत आन्दोलन के नेता अब्दुल जब्बार खां थे, जबकि असहयोग आन्दोलन के नेता प्रभाकर डूडीराज थे
  • 6 अप्रैल 1930 को जबलपुर में सेठ गोविंद दास एवं पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने नमक आन्दोलन की शुरुआत की
  • सिवनी ने नमक सत्याग्रह के नेता दुर्गाशंकर मेहता थे
  • 1930 में जबलपुर में जंगल सत्याग्रह की शुरुआत हुयी
  • जंगल सत्याग्रह के दौरान घोड़ा डोगरी क्षेत्र के आदिवासी कंधे पर नंबर डाल कर देता हाथ में लाठी लेकर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देते थे| गंजन सिंह कोरकू इनके नेता थे
  • 1931 में रतलाम में स्त्री सेवादल की स्थापना की गयी
  • 1920 में रतलाम कांग्रेस कमेटी की स्थापना स्वामी ज्ञानानंद के नेतृत्व में हुयी| मोहमद उमर खान इसके प्रथम अध्यक्ष थे|  
  • 1935 में भोपाल रतलाम मेंप्रजा परिषदका गठन हुआ
  • 1938 में स्थपित भोपाल राज प्रजामंडल ने खुले अधिवेशन में नागरिक स्वतंत्रता की मांग रखी
  • महात्मा गांधी जी ने द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर 1939 में जबलपुर में अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत की
  • 1942 मेंभारत छोड़ो आन्दोलनकी शुरुआत ग्वालियर रियासत ने विदिशा से की
  • झंडा सत्याग्रहमें राष्ट्रिय ध्वज को फहराने के मामले ने पंडित सुंदर लाल को छ: मास के कारावास की सजा हुयी थी|

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Hello दोस्तों मेरा नाम तापेंदर ठाकुर है। मैं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से स्नातक Post Graduate हूँ। मैं एक ब्लॉगर और यूट्यूबर हूँ। इस वेबसाइट के माध्यम से आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में सहायता मिलेगी | आप सबका मेरी वेबसाइट में आने का बहुत धन्यवाद।

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