February 2, 2023

Modern History of Bihar for Bpsc-History of Bihar In Hindi

बोधगया के विचार मंदिर के चारों ओर एक छोटी पाषाण वेदिका मिली है| इसका निर्माण भी शुंगकाल में हुआ था इसे कमल राजा, रानी, पुरुष, पशु, बोधिवृक्ष, छात्र, त्रिरत्न, कल्पवृक्ष आदि प्रमुख है|

-स्वर्ण मुद्रा निष्क दिनार स्वर्ण मात्रिक कहा जाता था तांबे के सिक्के काशअर्पण कहलाते थे| चांदी के सिक्के के लिए ‘पुराण’ अथवा ‘धारण’ शब्द आया है|

-तुम निकाल में समाज में बाल विवाह का प्रचलन हो गया था तथा कन्याओं का विवाह 8 से 12 वर्ष की आयु में किया जाने लगा था| 

– शुंगराजाओं का काल वैदिक काल की अपेक्षा एक बड़े वर्ग के लोगों के मस्तिक परंपरा संस्कृति एवं विचारधारा को प्रतिबिंबित कर सकने में अधिक समर्थ है| 

-शुंग काल में उत्कृष्ट नमूने बिहार के बोधगया से प्राप्त होते हैं भरहुत,साँची, शांति बेसनगर की कला भी उत्कृष्ट है|

कण्व वंश

शुंग वंश के अंतिम शासक देवहूति को मंत्री वासुदेव ने उसकी हत्या कर सता प्राप्त कर कण्व वंश की स्थापना की| कण्व वंश ने 75 ई.पु. से 30 ई.पु. तक शासन किया|  वासुदेव पाटलिपुत्र के कण्व वंश का प्रवर्तक था| 

-वैदिक धर्म एवं संस्कृति संरक्षण की जो परंपरा शुंगों ने प्रारंभ की थी| उसे कण्व वंश ने जारी रखा| इस वंश का अंतिम सम्राट सुसमी कण्य अत्यंत अयोग्य और दुर्बलता था| मगध क्षेत्र संकुचित होने लगा| कण्व वंश का साम्राज्य बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित हो गया और उनके प्रांतों में अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया| तत्पश्चात उसका पुत्र नारायण और अंत में सुसमी जिसे सातवाहन वंश के प्रवर्तक सिमूक ने उसने प्रद्युत कर दिया था| इस वंश के 4 राजाओं ने 75 ई.पु. से 30 ई.पु. तक शासन किया|

गुप्त वंश की स्थापना-गुप्त राजवंश की स्थापना महाराजा गुप्त ने 275 ईसवी में की थी उनका वास्तविक नाम श्री गुप्ता गुप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त प्रथम का पुत्र घटोत्कच था|

चंद्रगुप्त के सिहासन रोहण के अवसर पर 302 ई.को गुप्त स्वंत भी कहा गया है| चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार मगध के मृग शिखावन में एक मंदिर का निर्माण करवाया था, तथा मंदिर के बारे में 24 गांव को दान दे दिए थे|

– गुप्त के समय महाराजा की उपाधि सामंतों को प्रदान की जाती थी| अतः श्री गुप्त किसी के अधीन शासक था|

घटोत्कच- घटोत्कच श्री गुप्त का पुत्र था 270 ईसा पूर्व से 320 ईसा पूर्व तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा इसने भी महाराजा की उपाधि धारण की थी| 

चंद्रगुप्त प्रथम- यह घटोत्कच का उत्तराधिकारी था जो 320 ईसवी में शासक बना| 

– चंद्र गुप्त गुप्त वंशावली का सबसे पहला शासक था जो प्रथम स्वतंत्र शासक है यह विदेशि के विद्रोह द्वारा हटाकर शासक बना| 

-इसने नवीन सम्वत (गुप्त सम्वत) की स्थापना की| इसने लिच्छवी वंश की राजकुमारी कुमार देवी से विवाह सम्बंध स्थापित किया| 

चंद्रगुप्त प्रथम के शासन काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है| इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी| बाद में लिच्छवी को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया| इसका शासनकाल 320 ईसवी से 350 ईसवी तक चला| 

– पुराणों तथा प्रयाग प्रशस्ति चंद्रगुप्त प्रथम के राज्य के विस्तार के विषय में जानकारी मिलती है|

समुद्रगुप्त- चंद्रगुप्त प्रथम के बाद 350 ईसवी में उसका पुत्र समुद्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा| समुद्रगुप्त का जन्म लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी के गर्भ से हुआ था| संपूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के महानतम शासकों के रूप में वह नामित किया जाता है| इन्हें परक्रमांक कहा गया है| समुद्रगुप्त का शासन काल में राजनीतिक सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है| इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी| 

-समुद्रगुप्त ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की|

– विंसेंट स्मिथ ने इन्हें नेपोलियन की उपाधि दी,तथा समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है|

समुद्रगुप्त और साधारण सैनिक योग्यता वाला महान विद्युत सम्राट का यह उच्च कोटि का विद्वान तथा विद्या का उधार संरक्षक था| उसे कविराज भी कहा गया है| वह महान संगीतज्ञ था जिसे वीणा वादन का शौक था, जिसने प्रसिद्ध बौद्ध वसुबन्धु को अपना मंत्री नियुक्त किया था|

चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य- चंद्रगुप्त द्वितीय 385 ईसवी में से आसन पर आसीन हुआ|वह समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी दत्त देवी से हुआ था| वह विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ| उसने 385 से 495 ईसवी तक शासन किया था| 

-चंद्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देव, देव गुप्त, देवराज, देव श्री है| उसने विक्र्यांक, विक्रमादित्य, परम भागवत आदि की उपाधियाँ धारण की थी| उसने नागवंश वाकाटक और कदम्ब राजवंश के साथ वैवाहिक सबंध स्थापित किए| चंद्रगुप्त विद्यालय नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिसे एक कन्या प्रभाविति गुप्ता पैदा हुई| वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया| उसने प्रभावती गुप्त के सहयोग से गुजरात और काठियावाड़ की विजय प्राप्त की| 

-वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्तिय से शकों का उन्मूलन किया| कदम्ब राजवंश का शासन कुंतल (कर्नाटक) में था| 

कुमारगुप्त प्रथम(415 ई.से 455 ई.) – चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चात 415 ई. में उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिहांसन पर बैठा| वह चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्नीक ध्रुवदेवी से उत्पन्न सबसे बड़ा पुत्र था| जबकि गोविंदगुप्त उसका छोटा भाई था| यह कुमारगुप्त से ब्साठ (वैशाली) का राज्यपाल था| 

स्कन्दगुप्त (455 ई.से 467 ई.) – पुष्यमित्र के आक्रमण के समय से ही गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम की 455 ई. में मृत्यु ही गई| 

-उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र स्कन्दगुप्त सिहांसन पर बैठा| उसने सर्वप्रथम पुष्यमित्र की पराजित किया और उस पर विजय प्राप्त की| उसने 12 वर्ष तक शासन किया| स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि की उपधिया धारण की| कहिय अभिलेख में स्कन्दगुप्त को शक्रोप्न कहा गया है| 

हूणों का आक्रमण- हुणों का पथम आक्रमण स्कन्दगुप्त के काल में हुआ| हूण मध्य एशिया की एक बर्बर जाती थी| हूणों ने अपनी जनसंख्या और प्रसार के लिए दो शाखाओं में विभाजित होकर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए| पूर्वी शाखा के हुणों ने भारत पर अनेकों बार आक्रमण किया| स्कन्दगुप्त ने हुणों के आक्रमण से रक्षा कर अपनी संस्कृति की नष्ट होने से बचाया| 

गुप्तोतर बिहार – गुप्त साम्राज्य का 550 ईसवी में पतन हो गया| गुप्त वंश के पतन के बाद भारतीय राजनीति में विकेंद्रीकरण एवं अनिश्चितता का माहौल उत्पन्न हो गया| अनेक स्थानीय सामंतों एवं शासकों ने साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्रों में अलग-अलग छोटे-छोटे राजवंशों की स्थापना कर ली| इसमें एक था उत्तर गुप्त राजवंश| इस राजवंश ने करीब दो शताब्दियों तक शासन किया| इस वंश के लेखों में चक्रवर्ती गुप्त राजाओं का उल्लेख नहीं है| 

-परिवर्ती गुप्त वंश के संस्थापक कृष्णगुप्त ने (510 ई. से 521 ई.) स्थापना की| 

कुमारगुप्त– यह उतर गुप्त वंश का चौथा राजा था, जो जीवित गुप्त का पुत्र था| यह शासक अत्यंत शक्तिशाली एवं महत्वकांक्षी था| इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की| उसका प्रतिद्वंदी मोखेरी नरेश ईशान वर्मा समान रूप से महत्वकांक्षी शासक था| इस समय प्रयाग में पुष्यार्जन हेतु प्राणांत करने की प्रथा प्रचलित थी| 

पाल वंश – पूर्व मध्यकालीन राज वंश था| जब हर्षवर्धन काल के बाद समस्त उत्तरी भारत में राजनीतिक सामाजिक एवं आर्थिक द्वारा संकट उत्पन्न हो गया, तब बिहार, बंगाल और उड़ीसा के संपूर्ण क्षेत्र में पूरी तरह अराजकत फैली थी| 

आदिय्त सेन- माधवगुप्त की मृत्यु के 650 ई. के बाद उसका पुत्र आदित्य सेन मगध की गद्दी पर बैठा| वह एक वीर योद्धा और कुशल प्रशासक था| 

-अफ़सढ और शाहपुर के लेखों से मगध पर उसका अधिपत्य प्रआनित होता है| \

-आदित्य सेन ने 675 ई. तक शासन किया था| 

मौखरी वंश – मौखरी वंश का शासन उत्तर गुप्त काल के पतन के बाद स्थापित हुआ था| गया जिले के निवासी मौखरी लोग जो चक्रवर्ती गुप्त राजवंश के समय उत्तर गुप्त वंश के लोगों की तरह सामंत थे| 

-मौखरी वंश के लोग उत्तर प्रदेश के कन्नौज में तथा राजस्थान के बढ़वा क्षेत्र में तीसरी सदी में फैले हुए थे| मौखरी वंश के शासकों को उत्तर गुप्त वंश के चौथे शासक कुमारगुप्त के साथ युद्ध हुआ था, जिसमें ईशान वर्मा ने मौखरी वंश से मगध को छीन लिया था| 

बिहार में मुगल सम्राज्य 

1580 ई.के लगभग मुगल सम्राट अकबर ने बिहार को मुगल सम्राज्य का सूबा अथवा प्रांत बना दिया तथा खाने-ए-खनाम मुनीम खान को बिहार का गवर्नर नियुक्त किया| 

राजा मानसिहं ने 1587 से 1594 के बीच बिहार में मुगल सम्राज्य को सुदृढ़ता प्रदान की| 

– मानसिहं गिद्धौर, खड़गपुर और भोजपुर के स्थानीय सरदारों की पराजित किया और रोहतास की अपनी राजधानी बनाया| 

अकबर ने मुगल सम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित किया| जिसमें बिहार भी एक था| 

-जहांगीर ने मुगल शासन में आने के बाद लाल बेग उर्फ लाल बहादुर को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया|

इब्राहिम खान द्वारा पटना के समीप मनेर के मखदूम शाह दौलत का 1616 ईस्वी में निर्मित मकबरा बिहार में मुगल स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है| 

शाहजहां ने बाहर बादशाह जहांगीर के खिलाफ विद्रोह करके पटना, रोहतास इत्यादि क्षेत्र शाहजाद परवेज से 1622 से 1624 ई. के दौरान छीन लिए और पारंपरिक को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया| 

शहजादा परवेज की सेनाओं ने 36 अक्टूबर 1624 ई. को बहादुरपुर के समीप टोंस नदी ले तट पर खुर्रम की सेना की पराजित किया| 

-दाउद खान के समय गया जिले में दाउदनगर नाम का शहर बसाया गया तथा पटना में दाउदअदल का निर्माण हुआ| 

-दाउद खान के बाद 1665 ईस्वी में लश्कर खान बिहार का सूबेदार बना

– इस समय बिहार में ब्रिटिश यात्री बर्नियर आया जिसने पटना को सबसे बड़े शहरों में से एक माना तथा यहां शोरा के व्यापार के लिए डच कंपनी की उपस्थिति का भी उल्लेख किया| 

– औरंगजेब ने 17 से 2 ईसवी में अपने प्रिय पात्र शहजादा अजीम को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया| 

– अजीम ने पटना का पुनर्निर्माण कराया तथा इसका नया नाम अजीमाबाद कर दिया| 

– औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह सन 1707 से 1712 ईस्वी तक मुगल बादशाह बना| 

– बहादुर शाह ने शहजादा azeem-o-shaan को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया और फर्रुखसियार को बंगाल का नायब पद प्रदान किया गया|

-फर्रुखसियार 1711 ई. में बिहार आया| 

-फर्रुखसियार पहला मुगल बादशाह था, जिसका बिहार की राजधानी पटना में 1713 में राज्यभिषेक हुआ|

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